सुबोध भारती भाग 2 – आम का पेड़ | प्रश्न उत्तर, सारांश और अभ्यास प्रश्न
आम का पेड़
आइए, शुरू करें
हम अपने माता-पिता से हर समय कुछ न कुछ माँगते रहते हैं। न मिलने पर बहुत शिकायत करते हैं और मिल जाने पर भी अधिक देर खुश नहीं रहते, फिर बेचैन हो जाते हैं। ऐसा ही था आम का पेड़। फलों से लदे होने पर भी वह प्रसन्न नहीं था। हवा ने उससे ऐसा क्या कहा, जिससे पेड़ खुशी से झूमने लगा? आइए, पढ़ें...
उच्चारण-अभ्यास
अमियाँ, मुसकराई, चौंकते, टहनियाँ, ईर्द-गिर्द, धन्यवाद
एक गाँव में विशालकाय आम का पेड़ था। उस पेड़ पर बहुत ही रसीले आम लगते थे लेकिन बच्चे थे कि आम को पकने से पहले ही तोड़कर खा लेते थे। बेचारा पेड़ मन मसोसकर रह जाता। बच्चे आए दिन पेड़ की शाखाओं पर चढ़ते और कच्ची अमियाँ खाने के चक्कर में कई कमजोर डालियाँ तोड़ डालते।
आम का पेड़ सोचता कि वे पेड़ अच्छे हैं, जिन पर कोई फल नहीं लगते। कम से कम वे चैन से तो रहते हैं।
एक दिन की बात है। आम का पेड़ उदास था। हवा ने उससे पूछा, “क्यों भाई! क्या बात है? लगता है, काफ़ी परेशान हो।”
पेड़ बोला, “हवा बहना! क्या बताऊँ? काश! मैं भी तुम्हारी तरह चल-फिर सकता। यहाँ खड़े-खड़े तो मैं तंग आ गया हूँ। अच्छा होता, मैं दूर किसी घने जंगल में उगा होता!”
हवा ने सुना, तो हैरान हो गई मगर चुप रही। पेड़ ने कहा, “आबादी के पास हम फलदार वृक्षों का खड़ा रहना ही बेकार है। मुझे देखो! मैंने अब तक अपनी काया में पके हुए फल तक नहीं देखे। ये इंसानों के बच्चे फलों के पकने का भी इंतज़ार नहीं करते। देखो न, गाँव के बच्चों ने मुझ पर चढ़-चढ़कर मेरे अंगों का क्या हाल बना दिया है। कई टहनियों और पत्तों को तोड़ डाला है।”
हवा मुसकराई। फिर पेड़ से बोली, “पेड़ भाई! दूर के ढोल सुहावने होते हैं। जंगल में फलदार वृक्ष तो बहुत दुखी हैं। मुझे तो उनकी हालत पर तरस आता है।”
“जंगल में फलदार वृक्ष बहुत दुखी हैं! हवा बहना! तुम मज़ाक तो नहीं कर रहीं?” पेड़ ने चौंकते हुए पूछा।
“और नहीं तो क्या? जंगल के फलदार पेड़ अपने ही शरीर के फलों से परेशान रहते हैं। पेड़ों में फल बड़ी संख्या में लगते हैं। वहाँ फलों को खाने वाला तो दूर, तोड़ने वाला भी नहीं होता। पक्षी कितने फल खा पाते हैं? फल पेड़ पर ही पकते हैं। पेड़ बेचारे अपने ही फलों का वजन नहीं सँभाल पाते। फलों का बोझ सहते-सहते पेड़ का सारा बदन दुखता रहता है। जब फल पककर गिर जाते हैं, तभी जंगल के पेड़ों को राहत मिलती है। यही नहीं, ढेर सारे पके हुए फल पेड़ के ईर्द-गिर्द गिरकर सड़ते हैं। पेड़ बेचारे अपने ही फलों की सड़ाँध में चुपचाप खड़े रहते हैं।” हवा ने बताया।
“अच्छा बहना! मैं ऐसे ही ठीक हूँ। मेरे फल इतने मीठे हैं, तभी तो बच्चे उनके पकने का इंतज़ार नहीं करते। अरे हाँ, याद आया... पतझड़ के मौसम में ये बच्चे तो मेरे पास फटकते भी नहीं हैं। उन दिनों मैं परेशान हो जाता हूँ। यही बात मेरी टहनियों और पत्तों की, वसंत आते ही मेरे कोमल अंग उग आते हैं।” आम के पेड़ ने हवा से कहा।
हवा मुसकराते हुए आगे बढ़ गई। पेड़ ने मन ही मन हवा का धन्यवाद दिया और खुशी से झूमने लगा।
अभ्यास
मौखिक
1. पेड़ मन मसोसकर क्यों रह जाता था?
उत्तर: क्योंकि बच्चे आम के पकने से पहले ही उन्हें तोड़कर खा लेते थे और उसकी डालियाँ भी तोड़ देते थे।
2. अंत में पेड़ खुशी से क्यों झूमने लगा?
उत्तर: क्योंकि हवा की बातों से उसे समझ आ गया कि उसकी स्थिति जंगल के फलदार पेड़ों से बेहतर है। इसलिए उसने हवा का धन्यवाद दिया और खुशी से झूमने लगा।
लिखित
प्रश्न 1. पेड़ की कमजोर डालियाँ कैसे टूट जाती थीं?
उत्तर: बच्चे कच्ची अमियाँ खाने के लिए पेड़ पर चढ़ते थे और इसी कारण उसकी कमजोर डालियाँ टूट जाती थीं।
प्रश्न 2. पेड़ घने जंगल में क्यों उगना चाहता था?
उत्तर: क्योंकि वह बच्चों द्वारा फल तोड़ने और डालियाँ तोड़े जाने से परेशान था। उसे लगता था कि जंगल में वह चैन से रहेगा।
प्रश्न 3. जंगल के फलदार वृक्षों का बदन क्यों दुखता रहता था?
उत्तर: क्योंकि उनके फलों का वजन बहुत अधिक होता था। फलों का बोझ सहते-सहते उनका बदन दुखता रहता था।
प्रश्न 4. आम के पेड़ ने क्यों कहा, “अच्छा बहना, मैं ऐसे ही ठीक हूँ।”
उत्तर: क्योंकि हवा ने उसे बताया कि जंगल के फलदार पेड़ों की परेशानी उससे भी अधिक है। यह जानकर वह अपनी स्थिति से संतुष्ट हो गया।
5. कहानी पढ़कर वाक्यों को क्रम से लगाइए—
क. “अच्छा बहना! मैं ऐसे ही ठीक हूँ।”
ख. “अच्छा होता, मैं दूर किसी घने जंगल में उगा होता!”
ग. उस पेड़ पर बहुत ही रसीले आम लगते थे।
घ. “क्यों भाई! क्या बात है?”
ङ. “पेड़ भाई! दूर के ढोल सुहावने होते हैं।”
उत्तर (क्रम संख्या सहित):
क. 5 — “अच्छा बहना! मैं ऐसे ही ठीक हूँ।”
ख. 3 — “अच्छा होता, मैं दूर किसी घने जंगल में उगा होता!”
ग. 1 — उस पेड़ पर बहुत ही रसीले आम लगते थे।
घ. 2 — “क्यों भाई! क्या बात है?”
ङ. 4 — “पेड़ भाई! दूर के ढोल सुहावने होते हैं।”
भाषा की बात
1. ड़/ढ़ में अंतर समझिए। शब्दों को ज़ोर-ज़ोर से पढ़िए—
ड़ – पेड़, बड़ा, तोड़, सड़क, सड़ाँध, पतझड़
ढ़ – चढ़तें, चढ़, सीढ़ी, गढ़, पढ़ाई, कढ़ाई
2. शब्द बनाइए—
फल → फलदार
फूल → फूलदार
शान → शानदार
जायका → जायकेदार
विशाल + काय → विशालकाय
भीम + काय → भीमकाय
3. वचन बदलिए—
बच्चा → बच्चे
पत्ता → पत्ते
टहनी → टहनियाँ
शाखा → शाखाएँ
4. शब्द पढ़िए, समझिए और लिखिए—
रसीला → रसीली → रसीले
बेचारा → बेचारी → बेचारे
कच्चा → कच्ची → कच्चे
चना → चनी → चने
रसीला – पुल्लिंग, एकवचन
रसीले – पुल्लिंग, बहुवचन
रसीली – स्त्रीलिंग, एकवचन/बहुवचन
5. ज़ोर से पढ़िए, समझिए और लिखिए—
• खा पाते हैं – मुख्य क्रिया है – खाना
इसी प्रकार मुख्य कार्य लिखिए—
पकते रहते हैं – पकना
टूट जाती है – टूटना
दुखता रहता है – दुखना
सड़ते रहते हैं – सड़ना
ढो जाता है – ढोना
उग आते हैं – उगना
रचनात्मक गतिविधि
• चार–पाँच छोटे–बड़े आम बनाइए और उनमें रंग भरिए। आम का असली पत्ता भी चिपकाइए।

